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जब कानून मानवता से बढ़के हो जाता है…

“वो भात भात कह रही थी और ये कहते हुए उस मासूम 11 साल की बच्ची ने दम तोड़ दिया”, यह मेरी जिन्दगी की सबसे व्यथित कर देने वाली खबर है | कल मैने जबसे यह खबर देखी है मन में एक अजीब हलचल सी हो रही है | एेसा लग रहा है वो मासूम सी लड़की मेरे सामने भूख से बेहाल, अपेक्षित नजरों से मेरी ओर देखकर भात भात कह रही हो | यह सोच कर ही रुह काँप रही है की उस बेबस माँ के लिए वो क्षण कितना भयावह रहेगा |

आखिर इस मौत का जिम्मेदार कौन हैं ? लड़की की माँ ने बताया वो जब राशन लाने गई तो उसे राशन सिर्फ़ इसलिए नही दिया गया क्योंकि उसका राशन कार्ड आधार से जुड़ा नहीं था | यह एक अजीब हालात को बयां करने वाली घटना हैं | यह सरकारी तंत्रों की असफलता का सबूत है | एेसा तब तब होता है जब कानून मानवता से बढ़के माना जाने लगता हैं और सरकारें चोरों का पता लगाने के लिए सारी जनता को चोर की नजरों से देखनें लग जाती हैं | क्या आधार को जरुरी करने से पहले यह सुनिश्चित कर लेना जरुरी नही था की लगभग सारी जनसंख्या का आधार बन चुका हैं ? क्यों जल्दीबाजी में सारी चीजों को आधार से जोड़ना जरुरी किया गया जबकी सरकार के तरफ से आधार पंजीकरण आधा अधूरा ही करके छोड़ दिया गया ? आधार पंजीकरण का ठेका निजी फर्म को क्या इसलिए दिए गए की वो उससे कमाई कर सकें ?  जो परिवार सरकारी अनाज पर ही निर्भर हो वो 100 रुपए/ लोग के आधार का भुगतान कैसे कर पाता ? और सोचने वाली बात यह की जो आधार उस मासूम के मरने के बाद बना क्या वहीं उसके मरने से पहले नहीं बन सकता था ? क्या हम बस मामले को सलटाने और लीपापोती कर उसे रफा दफा कर देने की परंपरा अपना चुके हैं ?

अभी जब कुछ दिन पहले भारत को ग्लोबल हंगर इंडेक्स में 100वाँ स्थान मिला तो इस खबर की लीपापोती शुरू हो गई, पर कल इस मासूम की मौत नें सबूत देकर इस खबर को सच साबित कर दिया | सरकार के चोरी रोकने के नाम पर ना जाने कितनी मासूमों की जानें चली गई और कितनों की जाएगी और हर मरने वाला गरीब और बेबस ही होता हैं ? एेसा कानूनी शिकंजा कसने का क्या फायदा की मासूमों की ही जान जाए और चोर को खरोंच तक ना आए ? वैसे भी एेसी शायद ही कोई सरकार हो जिसे यह पता न हो की सरकारी सुविधाओं की चोरी अफसर, नेता और उनके चेले चमचे ही करते है, कोई गरीब व्यक्ति एेसा करने की हिम्मत नहीं रखता | तो फिर गरीबों को सुविधा देने मे हम थोड़ा कानून को लचीला क्यों नही बना सकते ? शायद एेसा करने से कोई बेटी फिर भूख से ना मरने पाए और गरीबों को जिने के तीन मुख्य चीजों में से रोटी की चिन्ता ना करना पड़े ?

जरुरत इस बात की भी है की कानून की आड़ में हम अपने मानवीय मूल्य ना भुल जाएं और जरुरतमंदो के प्रति जरुरत परने पर लचीला रुख अपनाए ताकी फिर कोई गरीब कल को कानून में फँसके किसी भी तरह दम ना तोड़ दे | एक अच्छा नागरिक बनने से पहले एक अच्छें मानव बनें और समाज को सुरक्षा देने अपना योगदान दें |

 

 

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